अमेरिकी वीजा नीति में हाल ही में बदलाव किया गया है, जिसके तहत डायबिटीज, मोटापा, हृदय रोग, कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य जैसी लंबी बीमारी वाले लोगों के लिए अमेरिका में प्रवेश कठिन हो सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग ने दुनियाभर के दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों को निर्देश दिया है कि वे वीजा आवेदकों का स्वास्थ्य, उम्र और वित्तीय स्थिति ध्यान से जांचें।
नई गाइडलाइन के अनुसार, वीजा अधिकारी तय करेंगे कि आवेदक भविष्य में अमेरिकी सरकारी संसाधनों पर बोझ तो नहीं बनेगा। इसके लिए यह देखा जाएगा कि क्या आवेदक अपनी मेडिकल खर्च खुद उठा सकता है, और परिवार के किसी सदस्य की स्वास्थ्य स्थिति उसके रोजगार या आर्थिक स्थिरता को प्रभावित तो नहीं करती।
पहले वीजा प्रक्रिया में मुख्य रूप से संक्रामक रोगों पर ध्यान दिया जाता था। अब पुरानी और दीर्घकालिक बीमारियों को भी निर्णय में शामिल किया जाएगा। मोटापा विशेष रूप से गंभीर माना गया है क्योंकि यह अस्थमा, उच्च रक्तचाप और स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति सिर्फ वीजा रिजेक्शन तक सीमित नहीं रहेगी। “चिलिंग इफेक्ट” के चलते लोग अपनी बीमारी छिपा सकते हैं या इलाज टाल सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर और जोखिम बढ़ेगा। इसका असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं और क्रॉनिक पेशेंट्स पर भी पड़ सकता है।
भारत में लगभग 10 करोड़ लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं। नए नियम के लागू होने पर भारतीय आवेदकों की अस्वीकृति दर 20-30% तक बढ़ सकती है। H-1B और ग्रीन कार्ड प्रक्रियाओं में भी कठिनाई आ सकती है, खासकर मध्यम आय वर्ग के पेशेवरों के लिए। इस नीति का मकसद सरकारी खर्च बचाना है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी गंभीर होंगे। स्वास्थ्य समस्याओं वाले अप्रवासी परिवारों के लिए वीजा पाना और अमेरिका में काम करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।









