जम्मू के अरनिया सेक्टर में सीमावर्ती किसानों ने सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। बॉर्डर किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन में किसानों ने अपनी पुरानी मांगों को जोरदार ढंग से उठाया। उनका मुख्य आरोप है कि दशकों से उन्हें 1947 के विभाजन और 1965 व 1971 के युद्धों के दौरान एलॉट की गई जमीनों पर मालिकाना हक और फेंसिंग के आगे लगी जमीनों के लिए उचित मुआवजा नहीं मिला।
किसानों का कहना है कि सीमा पर रहने के कारण वे लगातार सुरक्षा चुनौतियों और खेती में बाधाओं का सामना कर रहे हैं। फेंसिंग के कारण कई एकड़ जमीन खेती के लिए अनुपयोगी हो गई हैं, जिससे उनकी आय प्रभावित हुई है। इसके अलावा, सीमावर्ती इलाकों में बिजली की अनियमित आपूर्ति ने सिंचाई और घरेलू कामकाज में कठिनाइयां बढ़ा दी हैं। किसानों का तर्क है कि उन्हें मुफ्त बिजली मिलनी चाहिए ताकि उनकी आजीविका पर दबाव कम हो सके।
समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि 1947, 1965 और 1971 में विस्थापित हुए परिवारों को दी गई जमीनों पर मालिकाना हक उनका संवैधानिक अधिकार है, और यह लंबे समय से लंबित मामला है। प्रदर्शनकारी सरकार को अल्टीमेटम दे रहे हैं कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आंदोलन और तेज होगा।
स्थानीय लोगों और किसानों ने जोर देकर कहा कि अरनिया जैसे संवेदनशील सीमा क्षेत्र में रह रहे नागरिकों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन इसमें नारों और बैनरों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश दिखी। अरनिया बेल्ट में फेंसिंग के कारण प्रभावित हजारों एकड़ जमीन और सीमावर्ती किसानों की आजीविका की स्थिति पर यह आंदोलन सरकार का ध्यान खींचने की महत्वपूर्ण कोशिश है। किसान समिति का कहना है कि वे अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष जारी रखेंगे, लेकिन अनसुनी होने पर और व्यापक आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं।









