भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है, जो आम लोगों के साथ-साथ सम्मान प्राप्त कर चुके व्यक्तियों के लिए भी बड़ी सीख है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ‘भारत रत्न’, ‘पद्म विभूषण’, ‘पद्म भूषण’ और ‘पद्मश्री’ जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार किसी भी स्थिति में नाम का हिस्सा नहीं बनाए जा सकते। इन्हें न तो नाम के आगे और न ही पीछे उपाधि की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति है।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब हाईकोर्ट में एक याचिका के शीर्षक में प्रतिवादी के नाम के साथ ‘पद्मश्री’ लिखा हुआ पाया गया। न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि भले ही संबंधित व्यक्ति को यह सम्मान भारत सरकार द्वारा दिया गया हो, लेकिन इसे कानूनी दस्तावेजों या सार्वजनिक रूप से नाम के साथ जोड़ना संविधान के खिलाफ है।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 18(1) का हवाला देते हुए याद दिलाया कि भारत में उपाधियों को समाप्त किया गया है ताकि समानता बनी रहे। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के पुराने फैसले का उल्लेख किया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ये पुरस्कार सम्मान हैं, न कि टाइटल। यदि कोई व्यक्ति इन्हें नाम के हिस्से के रूप में इस्तेमाल करता है, तो यह नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुरस्कार से जुड़ी अधिसूचना के तहत संबंधित सम्मान को वापस लेने या रद्द करने तक की कार्रवाई संभव है। साथ ही अदालतों और पक्षकारों को निर्देश दिया गया कि वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानून का पूरी तरह पालन करें, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का कानून सभी पर बाध्यकारी है।
हालांकि जिस मामले में यह टिप्पणी आई, वह पुणे के एक ट्रस्ट से जुड़ा तकनीकी विवाद था, लेकिन कोर्ट की यह टिप्पणी राष्ट्रीय सम्मानों के सम्मानजनक और संवैधानिक उपयोग को लेकर एक स्पष्ट संदेश देती है।









