मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों से एशिया और यूरोप तक तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। इस स्थिति ने खासतौर पर उन देशों को प्रभावित किया है, जो ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।
भारत ने इस चुनौती के बीच अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव करते हुए वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख किया है। पहले जहां देश लगभग 45 प्रतिशत तक मिडिल ईस्ट से तेल आयात करता था, वहीं अब पश्चिम अफ्रीका और एशिया-प्रशांत क्षेत्रों से तेल खरीद बढ़ाई जा रही है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने हाल ही में अंगोला से 20 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है, जो सप्लाई सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग भी प्रभावित हुए हैं, जिससे एलपीजी सप्लाई पर दबाव बढ़ा है। इसका असर घरेलू बाजार में गैस की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों में उछाल से एशियाई रिफाइनर कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ गया है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियां भी अब नए स्रोतों से तेल खरीदने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह नई रणनीति भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी और वैश्विक संकटों के प्रभाव को कम करने में मददगार साबित होगी।









