मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पति का किसी दूसरी महिला के साथ विवाहेतर संबंध होना अपने आप में पत्नी के प्रति क्रूरता का प्रमाण नहीं है। अदालत के अनुसार, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 व 86 के तहत अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को विवाहेतर संबंध के अलावा क्रूरता से जुड़े अन्य ठोस सबूत भी पेश करने होंगे। शुक्रवार को जस्टिस सुंदर मोहन ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने ‘पिनाकिन महीपतराय रावल बनाम गुजरात राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल अवैध संबंध के आधार पर पति को क्रूरता के अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बच्चे के साथ महिला ने की थी आत्महत्या
यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा है, जिसने अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ आत्महत्या कर ली थी। महिला के परिवार का आरोप था कि उसका पति दूसरी महिला के साथ संबंध में था और दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करता था। इन्हीं परिस्थितियों को आत्महत्या की वजह बताया गया था। हालांकि, 23 अप्रैल 2018 को निचली अदालत ने पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग और क्रूरता के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
मृतका के भाई ने दायर की अपील
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने अपील नहीं की। इसके बाद मृत महिला के भाई ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया और फैसले को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने मामले के साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया। अदालत ने कहा कि केवल विवाहेतर संबंध को क्रूरता मान लेना उचित नहीं है। अभियोजन पक्ष को ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे, जिनसे कानूनी रूप से अपराध साबित हो सके। अंततः हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। इसी आधार पर मृतका के भाई की अपील खारिज कर दी गई।


