खाड़ी क्षेत्र में 28 फरवरी से जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल ला दिया है। कुछ ही हफ्तों में कीमत लगभग 93% बढ़कर 136.56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जिससे इंडियन ऑयल, HPCL, BPCL और रिलायंस जैसी कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव पड़ा है। जबकि दुनिया के कई देशों ने खुदरा ईंधन कीमतें बढ़ा दी हैं, भारत में सरकार और तेल कंपनियों ने अब तक स्थिरता बनाए रखी है, जिससे कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
राजनीतिक कारण भी स्थिति को जटिल बना रहे हैं। चार राज्यों और पुडुचेरी में चुनाव होने वाले हैं, इसलिए ईंधन कीमतों में बदलाव का जोखिम अभी नहीं उठाया जा रहा। मतदान के बाद 29 अप्रैल के बाद ही किसी बड़े कदम की उम्मीद की जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमत 3.7 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच चुकी है। ब्रेंट और यूराल्स तेल क्रमशः 40% और 50% से अधिक महंगे हो गए हैं। संकट की मूल वजह होर्मुज जलडमरूमध्य का अवरुद्ध होना है, जिससे वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि लंबा संघर्ष भारत के व्यापार घाटे और चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर के आसपास बनी रहती है, तो व्यापार घाटा लगभग 80 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे महंगाई, उद्योगों की लागत और विकास दर पर असर पड़ेगा। भारत के लिए यह वैश्विक ऊर्जा संकट गंभीर चुनौती बन गया है। आने वाले हफ्ते निर्णय ले सकते हैं कि देश इस संकट से सुरक्षित रहेगा या अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगेगा।









