Religion

प्रेमानंद महाराज की सीख: कैसे मोह-माया में फंसे बिना जी सकें सच्चा आनंद

आज की तेज़ और भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति कभी न कभी मोह-माया के जाल में उलझा हुआ महसूस करता है। खासकर गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग अक्सर सोचते हैं कि परिवार, पत्नी और सांसारिक जिम्मेदारियां आध्यात्मिक प्रगति में बाधा बन सकती हैं। इसी विषय पर हाल ही में हुए एक सत्संग में संत प्रेमानंद महाराज ने गहरी और सरल बातें साझा कीं, जो जीवन को देखने का नजरिया बदल सकती हैं।

सत्संग के दौरान एक भक्त ने अपनी उलझन जताई कि उन्हें दो प्रकार की माया घेर रही है – एक तो भगवान की माया और दूसरी उनकी पत्नी, जिनका नाम भी माया है। उन्होंने पूछा कि क्या ये दोनों बाधक हैं। इस पर प्रेमानंद महाराज ने बताया कि असली समस्या बाहरी दुनिया या पत्नी में नहीं, बल्कि हमारे भीतर की इच्छाओं और वासनाओं में है। यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे और परिवार व समाज के प्रति सही व्यवहार अपनाए, तो माया कभी बाधा नहीं बनेगी।

महाराज ने आगे कहा कि माया भगवान की दैवी शक्ति है। इसे केवल अहंकार के बल पर नहीं हराया जा सकता। नम्रता, समर्पण और कोमल स्वभाव ही हमें इस संसार रूपी सागर से सुरक्षित पार ले जा सकते हैं। उन्होंने पत्नी को बाधा नहीं, बल्कि अर्धांगिनी और जीवन का प्राण बताया। सही आचरण और सम्मान से वही जीवन में आध्यात्मिक यात्रा की सबसे बड़ी सहयोगी बन सकती हैं।

अंत में प्रेमानंद महाराज ने समझाया कि माया स्वयं दुख नहीं है। असली कष्ट हमारे गलत विचारों और कर्मों से उत्पन्न होते हैं। अगर हम चिंतन शुद्ध रखें और भगवान के नाम का सहारा लें, तो यही माया हमारे लिए आनंद और आशीर्वाद का मार्ग बन सकती है।