देशभर के हजारों शिक्षक केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ एक बार फिर दिल्ली की सड़क पर उतर आए हैं। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता और पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली को लेकर 22 राज्यों के विभिन्न संगठन 24 और 25 नवंबर को जंतर-मंतर पर एक बड़े आंदोलन में जुटे हैं। उनका कहना है कि वर्षों की सेवा के बाद नई पात्रता थोपना न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि उनके अधिकारों के खिलाफ भी है।
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों ने नियुक्ति के समय आवश्यक परीक्षाएं और चयन प्रक्रियाएं पूरी की थीं। ऐसे में अब टीईटी को अनिवार्य बनाना उनके अनुभव और योग्यता को नजरअंदाज करने जैसा है। कई राज्यों से आए शिक्षकों का कहना है कि वे 15 से 20 साल से स्कूलों में सेवा दे रहे हैं, इसलिए दोबारा पात्रता परीक्षा देने का दबाव अनुचित है। इसी को लेकर पूरे देश में लंबे समय से विरोध चल रहा था, जो अब राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट आंदोलन के रूप में सामने आया है।
आंदोलन में ओपीएस की बहाली प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है। संगठनों का कहना है कि कुछ राज्यों ने पुरानी पेंशन लागू कर उदाहरण प्रस्तुत किया है, लेकिन केंद्र की अनिच्छा अभी भी बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक पुरानी पेंशन सभी कर्मचारियों को नहीं मिलती और टीईटी अनिवार्यता समाप्त नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
दिल्ली में रविवार से ही विभिन्न राज्यों से शिक्षक जत्थों में आना शुरू हो गए। जंतर-मंतर पर तंबू, पोस्टर और मांगों से भरे बैनर नजर आ रहे हैं। संगठनों का कहना है कि संसद का सत्र चल रहा है, इसलिए यह सबसे उपयुक्त समय है कि सरकार कानून लाकर दोनों मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय ले। आंदोलनकारी शिक्षकों का विश्वास है कि इस बार उनकी आवाज को अनदेखा नहीं किया जा सकेगा और यह संघर्ष किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगा।









