डिजिटल खरीदारी को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए नया प्रस्ताव पेश किया है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने ड्राफ्ट नियमों के तहत हर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को अपने प्रोडक्ट्स पर ‘कंट्री ऑफ ओरिजिन’ फिल्टर उपलब्ध कराना अनिवार्य करने की योजना बनाई है। इस फीचर के जरिए ग्राहकों को यह पता चल सकेगा कि कोई उत्पाद किस देश में निर्मित हुआ है।
मंत्रालय का कहना है कि इस बदलाव से ग्राहक आसानी से ‘मेड इन इंडिया’ या विदेशी प्रोडक्ट्स को खोज सकेंगे और खरीदारी में स्मार्ट निर्णय ले पाएंगे। इसके अलावा, यह कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसी पहलों को भी मजबूती देगा।
सभी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स जो पैकेज्ड और इम्पोर्टेड प्रोडक्ट्स बेचते हैं, उन्हें अब प्रोडक्ट लिस्टिंग में फिल्टर जोड़ना होगा। यूजर इससे आसानी से ‘लोकल’ और ‘इम्पोर्टेड’ आइटम्स अलग कर सकेंगे। इससे कस्टमर के लिए समय बचेगा, इन्फॉर्म्ड चॉइस बढ़ेगी और मैन्युफैक्चरर्स को बराबरी का मौका मिलेगा।
यह बदलाव 2011 के लीगल मेट्रोलॉजी रूल्स में संशोधन के जरिए होगा। ड्राफ्ट नियम 2025 में जारी किया गया है और सभी संबंधित पक्षों से 22 नवंबर तक सुझाव मांगे गए हैं। यदि नियम पास हो जाता है, तो यह 2026 से लागू हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नया फिल्टर छोटे और लोकल ब्रांड्स को फायदा पहुंचा सकता है। इससे ग्राहक आसानी से ‘मेड इन इंडिया’ प्रोडक्ट्स को खोज पाएंगे, जिससे इनकी बिक्री 20-30% तक बढ़ सकती है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों के पालन की निगरानी आसान होगी और फर्जी या गलत ओरिजिन क्लेम को पकड़ना सरल होगा।
इस बदलाव से ग्राहक खरीदारी में भरोसा और जानकारी की आसानी महसूस करेंगे, लोकल मैन्युफैक्चरर्स को बाजार में प्रतिस्पर्धा में बराबरी मिलेगी और सरकार के लिए नियम उल्लंघन की पहचान करना आसान होगा। ई-कॉमर्स इकोसिस्टम अधिक ग्राहक-केंद्रित और पारदर्शी बनेगा, साथ ही डिजिटल मार्केट में ट्रस्ट बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।









