सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को मृत्युदंड के तरीके में बदलाव को लेकर सुनवाई हुई। अदालत में फांसी की सजा की जगह जहर का इंजेक्शन देने से जुड़ी याचिका पर विचार किया गया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार फिलहाल इस प्रक्रिया को बदलने के लिए तैयार नहीं है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुत पुरानी प्रक्रिया है और समय के साथ चीजें बदल चुकी हैं, लेकिन सरकार इसे बदलने को तैयार नहीं है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता ने केंद्र सरकार के वकील को सुझाव दिया कि दोषियों को मृत्युदंड देने के तरीके का विकल्प देने के प्रस्ताव पर सरकार विचार करे। इस पर केंद्र के वकील ने कहा कि इस विषय पर पहले भी ध्यान दिया गया है, लेकिन दोषियों को विकल्प देना व्यावहारिक नहीं हो सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मई 2023 के आदेश का हवाला दिया, जिसमें अटॉर्नी जनरल ने बताया था कि सरकार इस मुद्दे पर एक समिति के गठन पर विचार कर रही है।
यह याचिका वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई है। उन्होंने अदालत में दलील दी कि मृत्युदंड पाने वाले कैदियों को यह विकल्प मिलना चाहिए कि वे फांसी द्वारा सजा चाहते हैं या जहरीले इंजेक्शन से। उन्होंने कहा कि इंजेक्शन के जरिए दी जाने वाली सजा त्वरित, मानवीय और सभ्य तरीका है, जबकि फांसी देना क्रूर और बर्बर है क्योंकि इसमें शव करीब 40 मिनट तक रस्सी पर लटका रहता है।
मल्होत्रा ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है, जो फांसी देकर मृत्युदंड का प्रावधान करती है। याचिका में कहा गया है कि सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त होना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मृत्युदंड देने का तरीका जितना संभव हो, उतना कम पीड़ादायक होना चाहिए।
यह मामला नया नहीं है। ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में भी जनहित याचिका दाखिल कर मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों — जैसे जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना या बिजली का झटका देने — की मांग की थी। हालांकि, 2018 में केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के हलफनामे में कहा था कि फांसी की प्रक्रिया अन्य सभी तरीकों की तुलना में अधिक त्वरित और कम दर्दनाक है। सरकार ने यह भी कहा था कि फांसी से मौत जल्दी और सहज रूप से होती है तथा इसमें कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जो पीड़ा को अनावश्यक रूप से बढ़ाए।









